क्षमा
आह!
मेरा पाप-प्यासा तन
किसी अनजान, अनचाहे, अकथ-से बंधनों में
बँध गया चुपचाप
मेरा प्यार पावन
हो गया कितना अपावन आज!
आह! मन की ग्लानि का यह धूम्र
मेरी घुट रही आवाज़!
कैसे पी सका
विष से भरे वे घूँट...?
जँगली फूल सी सुकुमार औ’ निष्पाप
मेरी आत्मा पर बोझ बढ़ता जा रहा है प्राण!
मुझको त्राण दो...
दो...त्राण...."
और आगे कह सका कुछ भी न मैं
टूटे-सिसकते अश्रुभीगे बोल में
सब बह गए स्वर हिचकियों के साथ
औ’ अधूरी रह गई अपराध की वह बात
जो इक रात....।
बाक़ी रहे स्वप्न भी
मूक तलुओं में चिपककर रह गए।
और फिर
बाहें उठीं दो बिजलियों सी
नर्म तलुओं से सटा मुख-नम
आया वक्ष पर उद्भ्रांत;
हल्की सी ‘टपाऽटप’ ध्वनि
सिसकियाँ
और फिर सब शांत....
नीरव.....शांत.......।
~ दुष्यंत कुमार
क्षमा की वेला
आह-
भूल मुझ से हुई-मेरा जागता है ज्ञान,
किन्तु यह जो गाँठ है साझी हमारी,
खोल सकता हूँ अकेला कौन से अभिमान के बल पर?
-हाँ, तुम्हारे चेतना-तल पर
तैर आये अगर मेरा ध्यान,
और हो अम्लान (चेतना के सलिल से धुल कर)
तो वही हो क्षमा की वेला-
अनाहत संवेदना ही में तुम्हारी लीन हो परिताप, छूटे शाप,
मुक्ति की बेला-मिटे अन्तर्दाह!
~ अज्ञेय
दिल्ली-गुरदासपुर, 27 जुलाई, 1946
क्षमा करो कि अब तक जो कहा
क्षमा करो उसके लिए कि भी
मेरे मरने के बाद भी जो कुछ कहा जायेगा
क्षमा भी एक किस्म की मौत है
जिसे माँगने वाला कई बार मरता है
इस महादेश में जब मृतकों पर राजनीति होती है
धर्म और राष्ट्र जब व्यक्ति केंद्रित हो जाये
एक लेखक अपने मौत की घोषणा करता है
कहता है क्षमा करो हे महादेश
क्षमा मृत्यु है
और क्षमा मांगने के बाद क्षमाप्रार्थी की देह जिंदा रहती है
चेतना मर जाती है.
~ कुमार मंगलम
अग्नि परीक्षा
और हर शब उसी आग से
अब गुज़रता हूँ मैं
अन-किए पाप की
यूँ सज़ा काटता हूँ
कि शायद किसी सुब्ह
शीशे को देखूँ
तो माथे पे मेरे ये कालक न हो
राम की नीची नज़रें उठें
और क्षमा के हसीं फूल
मुझ पर निछावर करें
क़हर-ए-आतिश
बने भाग बहरूपिए का
मगर काश दिल मान ले
मैं वो सीता नहीं हूँ
जिसे सिर्फ़ इक बार
इस इम्तिहाँ से गुज़रना पड़ा था
कि मेरा हरन तो
इसी तरह हर रोज़ होगा
कि हर सुब्ह रावन है
हर रात अग्नी परिक्षा मुक़द्दर मिरा
~ सबा इकराम
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीति।
~ तुलसीदास (रामचरितमानस)
शक्ति और क्षमा
क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ, कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।
तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
~ रामधारी सिंह "दिनकर"
क्षमा असमर्थ मनुष्यों का गुण तथा समर्थ मनुष्यों का भूषण है।
~ वेदव्यास
क्षमा याचना
क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।
~ अटल बिहारी वाजपेयी
हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा
पढ़ाई चल रही है ज़िंदगी की
अभी उतरा नहीं बस्ता हमारा
मुआ'फ़ी और इतनी सी ख़ता पर
सज़ा से काम चल जाता हमारा
किसी को फिर भी महँगे लग रहे थे
फ़क़त साँसों का ख़र्चा था हमारा
यहीं तक इस शिकायत को न समझो
ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा
तरफ़-दारी नहीं कर पाए दिल की
अकेला पड़ गया बंदा हमारा
तआ'रुफ़ क्या करा आए किसी से
उसी के साथ है साया हमारा
नहीं थे जश्न-ए-याद-ए-यार में हम
सो घर पर आ गया हिस्सा हमारा
हमें भी चाहिए तन्हाई 'शारिक़'
समझता ही नहीं साया हमारा
~ शारिक़ कैफ़ी
फिर भँवर में है सफ़ीना इस लिए बेचैन हूँ
हो गया ज़ाएअ' पसीना इस लिए बेचैन हूँ
फिर ठिठुरती रात में फ़ुटपाथ पर होगा ग़रीब
आ गया फिर वो महीना इस लिए बेचैन हूँ
फिर सुना है सरहदों पर बढ़ गईं सरगर्मियां
फिर से होगा चाक सीना इस लिए बेचैन हूँ
सीख पाया ही नहीं अब तक मुआ'फ़ी का हुनर
है अभी सीने में कीना इस लिए बेचैन हूँ
कंकरों को जड़ लिया लोगों ने सरके ताज में
ठोकरों में है नगीना इस लिए बेचैन हूँ
आ गए हैं लौट कर सब चूम कर मिट्टी 'रियाज़'
मैं न जा पाया मदीना इस लिए बेचैन हूँ
~ राजीव रियाज़ प्रतापगढ़ी
Good, to forgive;
Best, to forget!
Living, we fret;
Dying, we live.
~ Robert Browning
वास्तव में क्षमा मानवीय भावों में सर्वोपरि है। दया का स्थान इतना ऊँचा नहीं। दया वह दाना है जो पोली धरती पर उगता है। इसके प्रतिकूल क्षमा वह दाना है जो काँटों में उगता है। दया वह धारा है, जो समतल भूमि पर बहती है, क्षमा कंकड़ों और चट्टानों में बहने वाली धारा है। दया का मार्ग सीधा और सरल है, क्षमा का मार्ग टेढ़ा और कठिन है।
~ प्रेमचंद (रंगभूमि )