क़िस्मत 

कोशिश भी कर, उम्मीद भी रख, रास्ता भी चुन। 

फिर इस के ब’अद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर।

~ निदा फ़ाज़ली 


ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते, यही इंतिज़ार होता

~ मिर्ज़ा ग़ालिब


उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ

ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ


डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा

कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी,, कि छुपा भी न सकूँ


ज़ब्त, कम-बख़्त ने, याँ आ के गला घोंटा है

कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ


नक़्श-ए-पा देख तो लूँ, लाख करूँगा सज्दे

सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ


बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को

ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ


इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर

अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ

~ अमीर मीनाई


बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला

क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में


कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए

दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

~ बहादुर शाह ज़फ़र 


परेशाँ रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ

सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ


हँसो और हँसते हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में

हमीं पे रात भारी है सितारो तुम तो सो जाओ


हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा

यही क़िस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ


तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया

ये बाज़ी हम ने हारी है सितारो तुम तो सो जाओ


कहे जाते हो रो रो कर हमारा हाल दुनिया से

ये कैसी राज़दारी है सितारो तुम तो सो जाओ


हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे

अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ

~ क़तील शिफ़ाई


चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है

तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है


उस की यादों ने उगा रक्खे हैं सूरज इतने

शाम का वक़्त भी आए तो सहर लगता है


एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत

उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है


मैं नज़र भर के तिरे जिस्म को जब देखता हूँ

पहली बारिश में नहाया सा शजर लगता है


बे-सहारा था बहुत प्यार कोई पूछता क्या

तू ने काँधे पे जगह दी है तो सर लगता है


तेरी क़ुर्बत के ये लम्हे उसे रास आएँ क्या

सुब्ह होने का जिसे शाम से डर लगता है

~ वसीम बरेलवी


आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता

जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता


जब ज़ुल्फ़ की कालक में घुल जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता


हँस हँस के जवाँ दिल के, हम क्यूँ न चुनें टुकड़े

हर शख़्स की क़िस्मत में इनआ'म नहीं होता


दिल तोड़ दिया उस ने ये कह के निगाहों से

पत्थर से जो टकराए वो जाम नहीं होता


दिन डूबे है या डूबी बारात लिए कश्ती

साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

~ मीना कुमारी नाज़


मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था

दिल भी या-रब कई दिए होते

~ मिर्ज़ा ग़ालिब


'ऐसा है तो मनुज-लोक, निश्चय, आदर पाएगा.

स्वर्ग किसी दिन भीख माँगने मिट्टी पर आएगा.

किंतु भाग्य है बली, कौन, किससे, कितना पाता है,

यह लेखा नर के ललाट में ही देखा जाता है.


'क्षुद्र पात्र हो मग्न कूप में जितना जल लेता है,

उससे अधिक वारि सागर भी उसे नहीं देता है.

अतः, व्यर्थ है देख बड़ों को बड़ी वास्तु की आशा,

किस्मत भी चाहिए, नहीं केवल ऊँची अभिलाषा.'


कहा कर्ण ने, 'वृथा भाग्य से आप डरे जाते हैं,

जो है सम्मुख खड़ा, उसे पहचान नहीं पाते हैं.

विधि ने क्या था लिखा भाग्य में, खूब जानता हूँ मैं,

बाहों को, पर, कहीं भाग्य से बली मानता हूँ मैं.


'महाराज, उद्यम से विधि का अंक उलट जाता है,

किस्मत का पाशा पौरुष से हार पलट जाता है.

और उच्च अभिलाषाएँ तो मनुज मात्र का बल हैं,

जगा-जगा कर हमें वही तो रखती निज चंचल हैं.

~ रामधारी सिंह दिनकर (रश्मिरथी) 


मैं अपना अज़्म ले कर, मंज़िलों की सम्त निकला था
मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी, क़िस्मत घर पे रक्खी थी

~ राहत इंदौरी 


नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही

ये खिड़की खोलो ज़रा सुब्ह की हवा ही लगे

~ बशीर बद्र


मैदाँ की हार जीत तो क़िस्मत की बात है
टूटी है किस के हाथ में तलवार देखना

~ निदा फ़ाज़ली 

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

~ निदा फ़ाज़ली 


कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है

~ बशीर बद्र 


जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया

~  साहिर लुधियानवी