इंसाफ़
दिल साफ़ हो किस तरह कि इंसाफ़ नहीं है
इंसाफ़ हो किस तरह कि दिल साफ़ नहीं है
~ मिर्ज़ा सलामत अली दबीर
आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है
जब तुझ से न सुलझें तिरे उलझे हुए धंदे
भगवान के इंसाफ़ पे सब छोड़ दे बंदे
ख़ुद ही तिरी मुश्किल को वो आसान करेगा
जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा
कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है
इस दर पे तिरा सीस झुकाना ही बहुत है
जो कुछ है तिरे दिल में सभी उस को ख़बर है
बंदे तिरे हर हाल पे मालिक की नज़र है
बिन माँगे ही मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें
दिल साफ़ हो जिन का वो यहाँ आ के सदा दें
मिलता है जहाँ न्याय वो दरबार यही है
संसार की सबसे बड़ी सरकार यही है
~ साहिर लुधियानवी
कुछ तो दे ऐ फ़लक-ए-ना-इंसाफ़
आह ओ फ़रियाद की रुख़्सत ही सही
~ ग़ालिब
वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है
मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है
ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
~ अहमद फ़राज़
न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है
जब तक न्याय न आता,
जैसा भी हो महल शान्ति का
सुदृढ़ नहीं रह पाता।
कृत्रिम शान्ति सशंक आप
अपने से ही डरती है,
खड्ग छोड़ विश्वास किसी का
कभी नहीं करती है|
~ रामधारी सिंह "दिनकर" (समर निंद्य है / भाग ३)
जिस जगह कटता है सर इंसाफ का ईमान का
रोज़ ओ शब नीलाम होता है जहाँ इंसान का
~ मख़दूम मोहिउद्दीन
कुछ और ज़माना कहता है कुछ और है ज़िद मेरे दिल की
मैं बात ज़माने की मानूँ या बात सुनूँ अपने दिल की
दुनिया ने हमें बे-रहमी से ठुकरा जो दिया अच्छा ही किया
नादाँ हम समझे बैठे थे निभती है यहाँ दिल से दिल की
इंसाफ़ मोहब्बत सच्चाई वो रहम-ओ-करम के दिखलावे
कुछ कहते ज़बाँ शरमाती है पूछो न जलन मेरे दिल की
जो बस्ती है इंसानों की इंसान मगर ढूँढे न मिला
पत्थर के बुतों से क्या कीजे फ़रियाद भला टूटे दिल की
~ शैलेन्द्र
मिलेगी शैख़ को जन्नत, हमें दोज़ख़ अता होगा
बस इतनी बात है, जिस के लिए महशर बपा होगा?
रहे दो दो फ़रिश्ते साथ अब इंसाफ़ क्या होगा?
किसी ने कुछ लिखा होगा किसी ने कुछ लिखा होगा
~ हरी चंद अख़्तर
कुछ देर ठहर जाइए ऐ बंदा-ए-इंसाफ़
हम अपने गुनाहों में ख़ता ढूँढ रहे हैं
~ सुदर्शन फ़ाकिर
कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
~ मुज़फ़्फ़र वारसी
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुँह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
अपने हों या पराए सबके लिये हो न्याय
देखो कदम तुम्हारा हरगिज़ न डगमगाए
रस्ते बड़े कठिन हैं चलना सम्भल-सम्भल के
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
इन्सानियत के सर पर इज़्ज़त का ताज रखना
तन मन भी भेंट देकर भारत की लाज रखना
जीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जल के,
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के
ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
~ कवि प्रदीप