ख़्वाहिश  

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।

सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ 

~ ऋग्वेद (दसवें मंडल के 129वें सूक्त (नासदीय सूक्त) का चौथा श्लोक)


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

~ मिर्ज़ा ग़ालिब

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

~ कैफ़ी आज़मी

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।

आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर॥

~ कबीर

ज़िंदगी क्या जो बसर हो चैन से

दिल में थोड़ी सी तमन्ना चाहिए

~ जलील मानिकपूरी

आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है

~ जिगर मुरादाबादी

सब ख़्वाहिशें पूरी हों ‘फ़राज़’ ऐसा नहीं है

जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते

~ अहमद फ़राज़


ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी, नहीं, कुछ कम है

हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है


घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है

अपने नक़्शे के मुताबिक़, ये ज़मीं कुछ कम है


बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी

दिल में उम्मीद तो काफ़ी है, यक़ीं कुछ कम है


अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में

कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है, कहीं कुछ कम है


आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब

ये अलग बात कि पहली सी नहीं, कुछ कम है

~ शहरयार


तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ

खिलौने दे के बहलाया गया हूँ

~ शाद अज़ीमाबादी

हँसने नहीं देता कभी रोने नहीं देता

ये दिल तो कोई काम भी होने नहीं देता


तुम माँग रहे हो मिरे दिल से मिरी ख़्वाहिश

बच्चा तो कभी अपने खिलौने नहीं देता

~ अब्बास ताबिश

स्वप्न झरे फूल से,

मीत चुभे शूल से,

लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे॥

 

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,

पाँव जब तलक उठे कि ज़िंदगी फिसल गई,

पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,

चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,

गीत अश्क बन गए,

छंद हो दफ़न गए,

साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,

और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके,

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे॥

~ गोपालदास “नीरज”


जो तुम आ जाते एक बार।

कितनी करुणा कितने संदेश

पथ में बिछ जाते बन पराग,

गाता प्राणों का तार-तार

अनुराग भरा उन्माद राग,

आँसू लेते वे पथ पखार!

जो तुम आ जाते एक बार॥

~ महादेवी वर्मा


तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

यह मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

मुझे ग़म है कि मैंने ज़िन्दगी में कुछ नहीं पाया

ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो, सब हमदर्द हैं मेरे

ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

 

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के क़िस्से, काम की बातें

बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

~ जावेद अख़्तर


बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा

इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा


इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश

फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा

~ परवीन शाकिर


बना बना के तमन्ना मिटाई जाती है

तरह तरह से वफ़ा आज़माई जाती है


जब उन को मेरी मुहब्बत का ऐतबार नहीं

तो झुका झुका के नज़र क्यों मिलाई जाती है


हमारे दिल का पता, वो हमें नहीं देते

हमारी चीज़, हमीं से छुपाई जाती है


‘शकील’ दूरी-ए-मंज़िल से ना-उम्मीद न हो

मंज़िल अब आ ही जाती है, अब आ ही जाती है

~ शकील बदायूनी


अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें


ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें


तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूं इतने हिजाबों में मिलें


आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें


अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़’

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

~ अहमद फ़राज़


मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँडने की न थी

मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा

~ जौन एलिया


मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में।

ना तो कौन क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में।

खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तलास में।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥

~ कबीर 


बाक़ी है अब भी तर्क-ए-तमन्ना की आरज़ू

क्यूंकर कहूँ कि कोई तमन्ना नहीं मुझे

~ आदिल असीर देहलवी


चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥

~ रहीम 


ये लम्हा लम्हा ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का हासिल है

कि लहज़ा लहज़ा अपने आप ही में मर रहा हूँ मैं

~ मुश्फ़िक़ ख़्वाजा


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है


रहबर-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में

लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है


वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

~ बिस्मिल अज़ीमाबादी  (राम प्रसाद बिस्मिल ने इसे लोकप्रियता दी) 


चाह नहीं मैं सुरबाला के

गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में

बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव

पर हे हरि! डाला जाऊँ,

चाह नहीं देवों के सिर पर

चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली!

उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक॥

~ माखनलाल चतुर्वेदी