इंतज़ार

I said to my soul, be still, and wait without hope

For hope would be hope for the wrong thing; wait without love,

For love would be love of the wrong thing; there is yet faith

But the faith and the love and the hope are all in the waiting.

Wait without thought, for you are not ready for thought:

So the darkness shall be the light, and the stillness the dancing. 

~ T.S. Eliot, East Coker (Four Quartets, 1940)


ये न थी हमारी क़िस्मत, कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते, यही इंतिज़ार होता

~ मिर्ज़ा ग़ालिब


इब्तिदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या

आगे आगे देखिए, होता है क्या

~ मीर तकी मीर

[इब्तिदा = शुरुआत]

 

प्रतीक्षा

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भान्ति कि जैसे, कोइ गत वीणा पर बज कर

अभी अभी सोयी खोयी सी, सपनो में तारों पर सिर धर

और दिशाओं से प्रतिध्वनियां जाग्रत सुधियों सी आती हैं

कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले

पर ऎसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले

सांसे घूम-घूम फिर फिर से असमंजस के क्षण गिनती हैं

मिलने की घडियां तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में मैनें पलक पांवडे डाले

अम्बर तो मशहूर कि सब दिन रह्ता अपने होश सम्हाले

तारों की महफ़िल ने अपनी आंख बिछा दी किस आशा से

मेरी मौन कुटी को आते, तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूं, पगचाप तुम्हारी मग से आती

रग-रग में चेतनता घुलकर, आंसू के कण सी झर जाती

नमक डली सा घुल अपनापन, सागर में घुलमिल सा जाता

अपनी बांहो में भर कर प्रिय, कंठ लगाते तब क्या होता?

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी प्रिय तुम आते तब क्या होता?

~ हरिवंशराय बच्चन

 

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से, मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

 

माना कि मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत

चुपके से किसी रोज़, जताने के लिए आ

 

जैसे तुझे आते हैं, न आने के बहाने

ऐसे ही किसी रोज़, न जाने के लिए आ

 

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो

रस्मो-रहे-दुनिया ही, निभाने के लिए आ

 

किस-किस को बताएँगे, जुदाई का सबब हम

तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

 

कुछ तो मेरे पिंदार-ए-मुहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझको, मनाने के लिए आ

 

एक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम

ऐ राहत-ए-जाँ, मुझको रुलाने के लिए आ

 

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें

ये आख़िरी शम्में भी बुझाने के लिए आ

~ अहमद फ़राज़

 

इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

अब तक रुका हुआ हूँ, वहीं रात रोक के

~ फ़रहत एहसास


फिर बैठे बैठे वादा-ए-वस्ल उसने कर लिया

फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इंतिज़ार का

~ अमीर मीनाई


कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा

मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

~ काइफ़ भोपाली


कहीं वो आ के मिटा दें न इंतिज़ार का लुत्फ़

कहीं क़बूल न हो जाए इल्तिजा मेरी

~ हसरत जयपुरी


हैरान हूँ इस क़दर कि शब-ए-वस्ल भी मुझे

तू सामने है और तेरा इंतिज़ार है

~ मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी


तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको

तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है

~ मुनव्वर राना


“Problems worthy of attack

prove their worth by fighting back.”

 ~ Piet Hein


The road to wisdom? Well, it's plain

And simple to express:

Err

and err

and err again,

but less

and less

and less.

~ Piet Hein


T.T.T.

Put up in a place

where it's easy to see

the cryptic admonishment

T.T.T.


When you feel how depressingly

slowly you climb,

it's well to remember that

Things Take Time.

~ Piet Hein


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय

~ कबीर दास 


वसंत की प्रतीक्षा

परिश्रम करता हूँ अविराम, बनाता हूँ क्यारी औ' कुंज।

सींचता दृग-जल से सानंद, खिलेगा कभी मल्लिका-पुंज।


न काँटों की है कुछ परवाह, सजा रखता हूँ इन्हें सयत्न।

कभी तो होगा इनमें फूल, सफल होगा यह कभी प्रयत्न।


कभी मधु राका देख इसे, करेगी इठलाती मधुहास।

अचानक फूल खिल उठेंगे, कुंज होगा मलयज-आवास।


नई कोंपल में से कोकिल, कभी किलकारेगा सानंद।

एक क्षण बैठ हमारे पास, पिला दोगे मदिरा-मकरंद।


मूक हो मतवाली ममता, खिले फूलों से विश्व अनंत।

चेतना बने अधीर मिलंद, आह वह आवे विमल वसंत।

~ जयशंकर प्रसाद


आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

~ मिर्ज़ा ग़ालिब


अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे

वो आ भी जाएँ तो आए न ऐतबार मुझे

~ खुमार बाराबंकवी


तेरे वादे पर जिए हम, तो यह जान, झूठ जाना 

कि खुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।

~ ग़ालिब  


कमाल-ए-इश्क़ तो देखो वो आ गए लेकिन

वही है शौक़ वही इंतिज़ार बाक़ी है

~ जलील मानिकपुरी

 

वो सुबह कभी तो आएगी

इन काली सदियों के सर से

जब रात का आँचल ढलकेगा

जब दुख के बादल पिघलेंगे

जब सुख का सागर छलकेगा

जब अम्बर झूम के नाचेगा

जब धरती नगमे गाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

~ साहिर लुधियानवी

(फ़िल्म: फिर सुबह होगी, 1958)


उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

~ बहादुर शाह ज़फ़र

 

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गराँ

रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव तले

ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

 

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

 

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

 

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं

सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

~ दुष्यंत कुमार